।। नीति के दोहे।।
॥ नीति के दोहे ॥
- गुरु गोबिंद दोऊ खड़े,काके लागूँ पाय।बलिहारी गुरु आपनो, गोबिंद दियो बताय॥
- पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय ढाई आखर प्रेमका, पढ़ै सो पंडित होय।
- निंदक नियरे राखिए,आँगन कुटी छवाय।बिन पानी, साबुनबिना ,निर्मल करै सुभाय॥
- तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम परकाज हित सम्पत्ति संचहिं सुजान॥
- बड़े बड़ाई ना करैं, बड़े न बोलें बोल । रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल ॥
- रुठे सुजन मनाइए,जो रुठें सौ बार । रहिमन फिर-फिरपोइये,टूटे मुक्ताहार॥ खीरा सिर तें काटिए,मलियत नोन लगाय।
- रहिमन करुए मुख्यको,चहिअत इहै सजाएजो बड़ेन को लघु कहैं,नहिं रहीम घटि ज़ाहि गिरिधर मुरलीधरकहे,कुछ दुख मानत नाहिं॥ Regards Dhruv
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